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विज्ञान

मनोवैज्ञानिकों, आनुवंशिकीविदों, तंत्रिका-वैज्ञानिकों और जीव-वैज्ञानिकों ने वही सवाल पूछे, जिन पर लोग आज भी खाने की मेज़ पर बहस करते हैं। उनके जवाब एक ही दिशा में जाते हैं।

बीमारी नहीं

WHO, अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन और इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी, तीनों यही कहते हैं।

चुनाव नहीं

यौन रुझान जीव-विज्ञान और विकास की प्रक्रिया से उभरता है। कोई यह नहीं चुनता कि वह किसकी ओर आकर्षित हो।

“ठीक” नहीं किया जा सकता

बदलने की कोशिशें काम नहीं करतीं, और अवसाद तथा आत्महत्या की कोशिशों से जुड़ी पाई गई हैं।

प्रकृति में मौजूद

सैकड़ों जानवर प्रजातियों में समलैंगिक व्यवहार दर्ज किया गया है।

हम क्या जानते हैं। वैज्ञानिक इस पर एकमत हैं कि यौन रुझान न चुना जाता है, न वह कोई बीमारी है। वे अभी यह समझने में लगे हैं कि वह बनता कैसे है। मौजूदा तस्वीर यह है कि इसमें कई आनुवंशिक, हार्मोनल और दूसरे जैविक प्रभाव मिलकर काम करते हैं; कोई एक कारण नहीं है, और कोई “गे जीन” भी नहीं। यह खुला सवाल प्रक्रिया के बारे में है। क्वीयर लोगों के वजूद पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। हम हर अध्ययन की सीमाएँ भी बताते हैं।

कौन सहमत है

कौन सहमत है

प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं की दशकों की स्वतंत्र समीक्षा, किसी एक समूह की राय नहीं।

1973अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन प्रमाणों की समीक्षा के बाद समलैंगिकता को अपनी निदान-पुस्तिका से हटा देती है।
1990विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण से हटा देता है। 17 मई अब IDAHOBIT के रूप में मनाया जाता है।
2018इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी कहती है कि समलैंगिकता कोई मानसिक बीमारी नहीं है, उसी साल जब सर्वोच्च न्यायालय इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करता है।
2022भारत का राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग राज्य परिषदों को बताता है कि कन्वर्ज़न थेरेपी पेशेवर कदाचार है।

सवाल दर सवाल

प्रमाण

क्या यह बीमारी है?

पहली कठोर जाँच 1957 में हुई। मनोवैज्ञानिक Evelyn Hooker ने 30 समलैंगिक और 30 विषमलैंगिक पुरुषों को, जो मरीज़ नहीं थे, व्यक्तित्व परीक्षण दिए, और फिर विशेषज्ञ चिकित्सकों से दोनों को पहचानने को कहा। वे नहीं कर पाए। समलैंगिक पुरुष मनोवैज्ञानिक रूप से बाकी सबकी तरह स्वस्थ थे। 1973 तक अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन समलैंगिकता को अपनी निदान-पुस्तिका से हटा चुकी थी; 1990 में WHO ने भी यही किया।

तो सर्वेक्षणों में क्वीयर लोगों में अब भी ज़्यादा चिंता और अवसाद क्यों दिखता है? Ilan Meyer का अल्पसंख्यक तनाव का मॉडल (2003) इसका जवाब देता है: यह अतिरिक्त पीड़ा कलंक, ठुकराए जाने, भेदभाव और पहचान छिपाने के बोझ से आती है, यौन रुझान से नहीं। जहाँ समाज ज़्यादा सुरक्षित होते हैं, वहाँ यह फ़र्क़ घटता है। अध्ययन पढ़ें

क्या यह चुनाव है?

किसी विषमलैंगिक व्यक्ति से पूछिए कि उसने विषमलैंगिक होना कब चुना, तो उसके पास कोई जवाब नहीं होता। शोध कई दिशाओं से एक ही जगह पहुँचता है:

  • जुड़वाँ। स्वीडन में लगभग 3,800 जुड़वाँ जोड़ों के एक अध्ययन में पुरुषों के समलैंगिक व्यवहार की भिन्नता का लगभग एक-तिहाई और स्त्रियों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा जीन से समझ आया। परिवार की साझा परवरिश से लगभग कुछ भी नहीं।
  • आनुवंशिकी। 4,77,522 लोगों के 2019 के विश्लेषण में कोई एक “गे जीन” नहीं मिला, बल्कि बहुत-से छोटे आनुवंशिक प्रभाव मिले जो मिलकर भिन्नता का एक हिस्सा समझाते हैं। लेखकों ने चेताया कि डीएनए से किसी के यौन रुझान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  • जन्म से पहले। एक ही माँ से जन्मा हर बड़ा भाई किसी पुरुष के समलैंगिक होने की संभावना बढ़ाता है, पर साथ पले सौतेले बड़े भाइयों का कोई असर नहीं होता। यह घर की ओर नहीं, गर्भ की ओर इशारा करता है।
  • दिमाग़। इमेजिंग और मरणोपरांत अध्ययनों में समूहों के बीच छोटे अंतर मिले हैं। ये शुरुआती सुराग़ हैं, कारण का प्रमाण नहीं।

लोग यह चुनते हैं कि अपनी भावनाएँ छिपाएँ या नहीं। भावनाएँ हों या न हों, यह वे कभी नहीं चुनते। अध्ययन पढ़ें

क्या इसे बदला जा सकता है?

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के 2009 के कार्यदल ने दशकों की “बदलने की कोशिशों” की समीक्षा की और पाया कि उनके काम करने का कोई भरोसेमंद प्रमाण नहीं है, जबकि उनसे नुक़सान होने के प्रमाण हैं। बाद के सर्वेक्षण ऐसी कोशिशों को अवसाद और आत्महत्या की कोशिशों की ऊँची दर से जोड़ते हैं। भारत का चिकित्सा आयोग अब डॉक्टरों द्वारा की गई कन्वर्ज़न थेरेपी को पेशेवर कदाचार मानता है। ठीक करने जैसा कुछ है ही नहीं। अध्ययन पढ़ें

क्या यह अप्राकृतिक है?

समलैंगिक व्यवहार सैकड़ों जानवर प्रजातियों में और अब तक अध्ययन किए गए हर मानव समाज में दर्ज हुआ है। Nature Ecology & Evolution में 2019 का एक शोध-पत्र तर्क देता है कि यह विकास-क्रम के शुरुआती दौर से ही पशु-जीवन का हिस्सा रहा होगा, कोई ऐसी विचित्रता नहीं जिसके लिए विशेष व्याख्या चाहिए। अध्ययन पढ़ें

1973, अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन। 1990, विश्व स्वास्थ्य संगठन। 2018, इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी। अलग-अलग दशक, एक ही निष्कर्ष।
इनमें से कोई भी समलैंगिक होने को बीमारी नहीं मानता

जुड़वाँ अध्ययन

जुड़वाँ अध्ययन

पुरुषों के समलैंगिक व्यवहार की भिन्नता का लगभग एक-तिहाई हिस्सा जीन से समझ आया। साझा परवरिश से लगभग कुछ भी नहीं। बाकी निजी कारकों से आया, जिनमें जन्म से पहले की स्थितियाँ भी शामिल हैं।

पीली पतली पट्टी साझा परवरिश है। पुरुषों के अनुमानित आँकड़े, Långström et al., 2010 से।

बदलता नज़रिया

भारत में नज़रिया

Pew Research ने भारतीयों से पूछा कि क्या समाज को समलैंगिकता को स्वीकार करना चाहिए। पाँच साल में स्वीकृति दोगुनी से ज़्यादा हो गई।

स्रोत: Pew Research Center, 2020।

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